रविन्द्रनाथ टैगोर के दार्शनिक चिंतन एवं वर्तमान संदर्भ में शिक्षा की प्रांसगिता-एक अध्ययन
श्रीमती रंजना ठाकुर
सहायक प्राध्यापक, के.डी. रूंगटा विज्ञान एवं तकनीकी महाविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
परिचय-
मानव शुरु से ही चिन्तनशील प्राणी रहा है। ये चिंतन ही दर्शन का मूल है। कोई भी चिन्तन कितना ही प्राचीन क्यों न हो उसकी उपादेयता कभी समाप्त नहीं होती। शिक्षा और दार्शनिक चिंतन में अविछिक संबंध है। दर्शन हमारे जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करता है। शिक्षा उस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। रविन्द्रनाथ टैगोर आधुनिक युग के एक महान् दार्शनिक एवं शिक्षाशास्त्री थे। अपने मौलिक एवं नये विचारों के द्वारा भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपनी भारतीय संस्कृति के आधार पर ये केवल भारतीय शिक्षा की नींव ही नहीं डाली वरन् पाश्चात्य शिक्षा में भी पूर्व एवं पश्चिम के आदर्शों को नये रूप में स्थापित किया। इनके इन्हीं महान् कार्यों के कारण ‘गरूदेव‘ (राष्ट्रपिता ने) की उपाधि से सम्मानित किया गया।
इन्होंने अपने संदेश में शिक्षा को प्राकृतिक वातावरण में दिये जाने पर बल दिया। अतः ये प्रकृतिवादी शिक्षा के पक्षधर थे।
टैगोर ने शिक्षा के क्षेत्र में प्रकृति को विशेष महत्व दिया है। इनका कहना था कि बालक को पुस्तक के स्थान पर जहाॅं तक संभव हो सकें, प्रत्यक्ष स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान किये जाने चाहिये। इन्होंने सर्वोच्च शिक्षा उसे कहाॅं है जो सम्पूर्ण सृष्टि से हमारे जीवन का सांमजस्य स्थापित करती है। अध्ययन अध्यापन के लिये ये स्वतंत्र एवं प्राकृतिक वातावरण को उपयुक्त एवं श्रेष्ठ समझते थ,े इसलिये इन्होंने 1901 में बोलपुर नामक स्थान पर ‘शांति निकेतन‘ नाम से एक विद्यालय की स्थापना की जो आज ‘विश्वभारती‘ विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध है। शांति निकेतन में ही रहकर इन्होंने ‘गीतांजलि‘ नामक रचना लिखी। जिस पर 1912 में इन्हें ‘नोबेल पुरूस्कार‘ प्राप्त हुआ। टैगोर नोबेल पुरूस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे। इनके अतिरिक्त इन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की, अनेकों देशों का भ्रमण किया तथा विभिन्न विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिया जिससे इनकी ख्याति में और भी अधिक वृद्धि हुई। टैगोर ने भारत के
बौद्धिक, कलात्मक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक आदि विभिन्न क्षे़त्रों को प्रभावित किया, इनका व्यक्तित्व महान् था, विलक्षण था।
शोध की आवश्यकता एवं महत्व-
वर्तमान समय में शिक्षा का गिरता हुआ स्तर जिससे पूरा समाज ग्रसित है खासकर विद्यार्थी वर्ग इससे सर्वाधिक प्रभावित हो रहा है, उनमें अनुशासनहीनता अकर्मव्यता, उद्दण्डता आदि निरन्तर बढ़ते जा रही है। वर्तमान परिवेश में चारों तरफ अव्यवस्था व्याप्त है। व्यक्ति के चरित्र का हनन हो रहा है। गिरते हुये नैतिक स्तर का कारण भी हमारी शिक्षा व्यवस्था है। शिक्षा की सार्थकता को बढ़ाने में रविन्द्रनाथ टैगोर जी का आधुनिक दृष्टिकोण अनुकरणीय है।
पं. नेहरुः ‘‘शिक्षा संतुलित मानव का विकास करती है।‘‘ शिक्षा के माध्यम् से ही हम देश के भावी पीढ़ी को सही दिशा की ओर मोड़ सकते है।
इसीलिये वर्तमान परिस्थिति में रविन्द्रनाथ टैगोर के दार्शनिक चिन्तन एवं शिक्षा के प्रति आधुनिक दृष्टिकोंण की प्रासंगिकता का अध्ययन आवश्यक है।
शोध समस्या-
वर्तमान समाज में मानवीय मूल्यों का निरंतर हास होता जा रहा है। विद्यार्थियों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति, शिक्षकों को कर्तव्यहीनता एवं शिक्षा की उद्देश्यहीनता हमारे चिंता का विषय है। वर्तमान समाज की शिक्षा व्यवस्था को एक अच्छे मार्ग दिखाने की आवश्यकता है जो मानव का चहुॅंमुखी विकास कर सकें। इस संदर्भ में रविन्द्रनाथ टैगोर जी शिक्षा के प्रणेता तथा उनके क्रांतिकारी विचार विश्व के लिये एक प्रेरणा के स्रोत है। टैगोर ने मानव जीवन के सभी पहलुओं का अध्ययन किया एवं इन्होंने मनुष्य को सर्वोच्च स्थान दिया । ये मनुष्य को ईश्वर का रूप मानते है। अतः वर्तमान संदर्भ में टैगोर के दार्शनिक चिंतन एवं शिक्षा का मनुष्य एवं प्रकृति के साथ अटूट संबंध ही शोध की समस्या है।
शोध उद्देश्य-
प्रस्तुत अनुसंधान के निम्नलिखित उद्देश्य है -
1. टैगोर के ग्रेथों, लेखों, व्याख्यानों एवं साहित्यिक रचनाओं से दार्शनिक एवं शैक्षिक तथ्यों को विश्लेषित करना।
2. टैगोर द्वारा प्रतिपादित शैक्षिक उद्देश्यों, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि एवं शिक्षक तथा शिक्षार्थी संबंध तथा अनुशासन आदि से संबंधित विचारों का अध्यापन करना।
3. टैगोर के दार्शनिक चिंतन को विश्लेषित करते हुये उनके वर्तमान समय में शिक्षा के प्रति आधुनिक दृष्टिकोण की महत्ता का विश्लेषण करना।
4. टैगोर के द्वारा शिक्षा का पंरपरागत् स्वरूप् को प्राकृतिक वातावरण से जोड़कर बच्चों में क्षिक्षा के प्रति उचित दृष्टिकोण अपनाना।
शोध सीमांकन-
किसी भी अनुसंधान को वैद्य, विश्वसनीय, तर्कसंगत परिणाम तक पहुॅंचाने हेतु समस्या का सीमांकन आवश्यक होता है। प्रस्तुत शोध कार्य में रविन्द्रनाथ टैगोर के दार्शनिक चिंतन को आधार बनाया गया है। प्रमुख रूप् से उनसे संबंधित ग्रंथों, साहित्य व्याख्यानों का उपयोग करने हेतु उनके आधुनिक दृष्टिकोंण को शैक्षिक विचारों की वर्तमान सेदर्भ में प्रासंगिकता का अध्ययन करना ही इस शोध का सीमांकन है।
शोध विधि-
टैगोर ने शोध विधि को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों प्रकृति के वास्तविक तथ्यों और समाज के वास्तविक जीवन के अनुकूल बनाने पर बल दिया। उनके अनुसार अतीत के झाॅंककर, दार्शनिक चिंतन एवं शिक्षा की वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता का अध्ययन, सर्वेक्षण प्रयोग या अन्य विधि से नहीं किया जा सकता। इसलिये प्रस्तुत शोध प्रबंध की विधि, पुस्तकालय अध्ययन पर ही आधारित न होकर यह प्राकृतिक वातावरण पर भी जोर दिया, जिसे बालक सीधे एवं प्रत्यक्ष रूप से सीखता है। यह एक दार्शनिक समस्या समाधान मूलक भी है।
शोध उपकरण-
प्रस्तुत शोध दार्शनिक चिंतन पर आधारित होने के कारण ग्रंथालय को प्रमुख स्रोत माना गया है। पुस्तकालय के अंतर्गत् आने वाले टैगोर से संबंधित विशेष ग्रंथों सारांशों, विश्वकोष, संदर्भ ग्रंथ, लेख साप्ताहिक, मासिक, वार्षिक पत्र-पत्रिकाओं (लिसमें उन्होंने प्रकृति के साथ संबंध) के माध्यम से शोध कार्य पूर्ण करने का प्रयास किया गया है।
परिणाम एवं चर्चा-
रविन्द्रनाथ जी का दार्शनिक चिंतन एवं शिक्षा सम्पूर्ण मानव जाति के लिये है, उनकी शिक्षा सार्वभौमिक तथा उन मानवीय मूल्यों को प्रतिपादित करती है, जिनकी उपादेयता सभी के लिये है यदि बालक को एक आदर्श नागरिक बनाना है, हमें उसमें अच्छे संस्कार, विचारों में परिवर्तन, परिमार्जन तथा परिवर्धन लाना होगा। हमें रविन्द्रनाथ जी के दार्शनिक चिंतन को अपने शैक्षिक पृष्ठभूमि में अत्मसात् करना होगा।
टैगोर के अनुसार बालक को केवल पाठ्य-पुस्तकों का ही अध्ययन नहीं करना चाहिये वरन् सभी स्रोतों से सीधे ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। टैगोर की शिक्षा हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाती है। नैतिकता के अभाव में कोई भी व्यक्ति , समाज या राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता। यह नैतिकता हमें अच्छें अनुशासन से मिलती है। टैगोर बालक को कठोर दण्ड देने के विरोधी है। इन्होंने अनुशासन को एक नैतिक मूल्य या आदर्श माना है। टैगोर ने अनुशासन के अर्थ को स्पष्ट करते हुये कहते है- ‘‘वास्तविक अनुशासन का अर्थ है अपरिपक्व एवं स्वाभाविक आवेगों की अनुचित उत्तेजना और दिशाओं में विकास से सुरक्षा, स्वाभाविक अनुशासन की इस स्थिति में रहना छोटे बच्चों के लिये सुखदायक है। यह उनके पूर्ण विकास में सहायक होता है।‘‘
टैगोर ने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिये एक ऐसी शिक्षा की संकल्पना की जो मानव का पूर्ण एवं संतुलित विकास करें जिसमें समाज एवं राष्ट्र दोनों की प्रगति हो। जिसके लिये उन्होंने अपने समय की क्रमबद्ध तथा निष्क्रिय शिक्षा का विरोध किया और बताया कि सभी शिक्षा का उद्देश्य यह होना चाहिये कि वह बालक को जीवन तथा विश्व के स्वर के मिलन से पूर्णतया अवगत् कराये तथा दोनों के मेल के मध्य संतुलन स्थापित करें। टैगोर ने इस आदर्श को अपने विश्व-भारती में पूरा किया।
टैगोर ने विद्यार्थी जीवन को बहुत पवित्र माना है। विद्यार्थियों में शिक्षण के दौरान कुछ अवश्य गुणों की अपेक्षा की है- 1 व्यवहार में विनम्रता 2 आचरण में व्यवस्था और स्वच्छता 3 नियमों और आज्ञाओं का का पालन 4 शरीर एवं वातावरण की सफाई 5 व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन मंे अनुशासन 6 आत्मानुभूमि आदि। इनमें से अधिकांश नियम आज भी उपयोगी है, जिनका पालन करके विद्यार्थी समाज व राष्ट्रके सभी नागरिक बन सकते है। टैगोर के समय में भी सदाचार एवं संयम पर विशेष बल दिया जाता था। आज गुरु एवं शिष्य के बीच बढ़ रही दूरी चिंता का विषय है। शिक्षक केवल वेतन भोगी बनकर रह गया है, शिष्य ने शिक्षक के प्रति शिष्टाचार व सम्मान को तिलांजलि दे दी है, इसके लिये जिम्मेदार हमारी शिक्षा प्रणाली है, अतः हमें ऐसी शिक्षा की जरूरत है जो बालकों में अच्छी भावना को जन्म दे सकें। इसके लिये टैगोर ने शिक्षक को अपनी शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान दिया है।
टैगोर के अनुसार-
‘‘शिक्षा केवल शिक्षक के द्वारा ही दी जा सकती है, शिक्षण विधि के द्वारा नहीं।‘‘ शिक्षक में सेवा, त्याग, सहयोग, लगन, प्रसन्नता, कर्तव्यपरायणता आदि गुण होने चाहिये, जिससे विद्यार्थी प्रभावित हो सकें। टैगोर क मत है कि शिक्षक को मनोविज्ञान का ज्ञान होना चाहिये, जिसके आधार पर वह विद्यार्थी के महत्व को समझ सकेगा।
टैगोर ने ऐसी शिक्षण विधि पर बल दिया, जिससे बालक की जिज्ञासा और रूचि बनी रहे। टैगोर ने निम्नलिखित विधि पर बल दिया - 1 भ्रमण के समय पढ़ाना 2 क्रिया विधि 3 वाद-विवाद तथा प्रश्नोत्तक विधि। यद्यपि टैगोर के समय में शिक्षा के स्तर मौजूद नहीं थे। अतः उनके जो विचार एवं वैज्ञानिक चिंतन है, उसमें शिक्षा का प्रत्येक क्षेत्र प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकता। रविन्द्रनाथ जी के आध्यात्मिक एवं नैतिक शिक्षा सार्वभौमिक एवं उन मानवीय मूल्यों को प्रतिपादित करती है, जिनकी उपयोगिता एवं सार्थकता प्रत्येक देश तथा काल में सदैव बनी रहेगी।
निष्कर्ष-
निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि टैगोर ने भारतीय संस्कृति के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा की नींव डाली। टैगोर ने शिक्षा का स्वरूप् अर्थ, समृद्ध और पूर्ण रूप् में लिया है। जीवन की पूर्णता के लिये टैगोर ने जो विधान निर्मित किया है वह भारतीय और पाश्चात्य दोनों के जीवन को स्पर्श करती है उसमें आध्यात्मिक और भौतिक दोनों तत्वों का समन्वय है। दर्शन और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों का समन्वय करके टैगोर ने भारतीय शिक्षा में महान् क्रांति की है। टैगोर द्वारा दिये गये शिक्षा-दर्शन के सिद्धांत को ध्यान में रखा जायें जिससे बालक का चहॅुमुखी विकास होगा एवं वर्तमान शिक्षा में प्रतिपादित किया जायें इससे विद्यार्थियों में बढ़ रही अनुशासनहीनता, उद्ण्डता, कत्र्तव्यहीनता कम होगी। अतः वर्तमान में रविन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षा संबंधित सिद्धांतों की महत्ता आवश्यक है जो हमारे आने वाली पीढ़ी को नैतिक एवं मानवीय मूल्यों की ओर आकृष्ट करके उनकी महत्वाकांक्षओं को पूर्ण करते हुये उनके चरित्र में उत्तम गुणों का विकास करें जिससे समाज, देश, राष्ट्रीय, अंर्तराष्ट्रीय एकता बनी रहे।
संदर्भ ग्रंथ-
1. पचैरी गिरीश एवं पचैरी रितु-उभरते भारतीय समाज में शिक्षक की भूमिका आर. लाल बुक डिपो, मेरठ
2. सक्सेना स्वरूप एन. आर.-‘‘शिक्षा सिद्धांत‘‘-आर.लाल. बुक डिपो, मेरठ
3. लाल बिहारी-प्रो0 रमन एवं तोमर गजेन्द्र सिंह-विश्व के श्रेष्ठ शैक्षिक चिन्तक-प्रकाशक आर. लाल बुक डिपो मेरठ संस्करण: 2008
4. गुप्ता एस. पी.-भारतीय शिक्षा का इतिहास, विकास एवं समस्यायें, गुप्ता अलका-शारदा पुस्तक भवन युनिवर्सिटी रोड इलाहाबाद-211002
5. विश्व के श्रेष्ठ शैक्षिक चिन्तक, लाल एवं तोमर (प्रो0 रमन बिहारी लाल, डाॅ0 गजेन्द्र सिंह तोमर) आर लाल बुक डिपो निकट गवर्नमेण्ट इण्टर कालेज मेरठ 250001 संस्करण: 2008
6. भारतीय शिक्षा का इतिहास, विकास एवं समस्यायें प्रो. एस.पी. गुप्ता, शारदा पुस्तक भवन, पब्लिसर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स 11 यूनिवर्सिटी रोड, इलाहाबाद-211002 श्रीमती (डा) अलका गुप्ता संस्करण 2010
7. शिक्षा के सामान्य सिद्धान्त-पी.डी. पाठक, जी.एस.डी. त्यागी प्रकाशक - विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा-2
Received on 14.11.2013 Modified on 19.11.2013
Accepted on 28.12.2013 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 45-47